भारतीय संस्कृति एक अमूल्य धरोहर के रूप में हमारे सामने उपस्थित है, जिस पर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक विकास की अनेक छापें अंकित होती रही हैं। धार्मिक दृष्टि से भारत किसी एक धर्म का देश नहीं है। यहाँ आदिवासी परम्पराएँ, हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, सिख तथा ईसाई सभी धर्मों और संस्कृतियों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
इस समन्वय की झलक हमारे लोकगीतों, रीति-रिवाजों, त्योहारों, लोककथाओं, भाषाओं और साहित्य में सहज रूप से देखी जा सकती है। विभिन्न धर्मों के अनुयायी होने के बावजूद भारतीय समाज के विश्वास, जीवन-मूल्य और मानवीय आदर्श अनेक स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही परस्पर प्रभाव और आदान-प्रदान सामासिक संस्कृति की वास्तविक पहचान है।
भारतीय भक्ति परम्परा सामासिक संस्कृति का अत्यन्त सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है। सगुण हो या निर्गुण, तुलसी हों या कबीर, हिन्दू हों या मुस्लिम— सभी संतों और भक्तों की मूल प्रवृत्तियों में आश्चर्यजनक समानता दिखाई देती है। यह सामासिक संस्कृति का ही प्रभाव है कि दोनों धाराओं ने भजन, कीर्तन, ईश्वर-नाम और प्रेम-भक्ति को समान रूप से स्वीकार किया।
सूफी संतों और कृष्णभक्तों की साधना में कीर्तन की प्रमुखता है, वहीं तुलसीदास ने राम से भी अधिक राम-नाम की महिमा का प्रतिपादन किया। वास्तव में 'नाम' वह सूत्र है जो सगुण और निर्गुण दोनों उपासना-पद्धतियों का सुंदर सामंजस्य स्थापित करता है।
दूजा कहा न जाय।
साहब दूजा जो कहूँ,
साहब खरा रिसाय।।
अकथ अगाध अनादि अनूपा।।
मोरे मत बड़ नाम दुहुंते।
किये जेहि प्रभु निज बस बूते।।
हिन्दू और मुस्लिम संतों ने समान रूप से गुरु की महिमा को स्वीकार किया। जब धार्मिक मान्यताओं के मूल तत्व भी परस्पर एक-दूसरे से जुड़ते हों, तब इससे बड़ा सांस्कृतिक समन्वय और क्या हो सकता है? एक परम्परा का संस्कार दूसरी परम्परा को प्रभावित करे, यही सामासिक संस्कृति का वास्तविक स्वरूप है।
कबीरदास जी ने गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ स्थान देते हुए कहा है—
काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविन्द दियो बताय।।
इसी प्रकार सूरदास, तुलसीदास और जायसी ने भी गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त की है। सभी भक्त कवियों के साहित्य में विनम्रता, समर्पण और अहंकार-त्याग की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
मो सो कौन छोटों।
राम सों खरी है कौन,
मो सो कौन खोटो।।
अब हरि हैं मैं नाहिं।
सब अंधियारा मिट गया,
दीपक देखा माहिं।।
भारतीय चिंतन में ज्ञान, भक्ति और कर्म— तीनों मार्गों का अद्भुत समन्वय मिलता है। तुलसीदास ने कहा है—
उभय हरहिं भव सम्भव खेदा।।
भारतीय संस्कृति को यदि प्राणतत्त्व कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ रहने वाले लोग सदैव एक-दूसरे के संस्कारों से प्रभावित होकर उनकी श्रेष्ठ बातों को अपनाते रहे हैं। भक्ति काल के संत निरंतर देश-देशांतर की यात्राएँ करते रहे। परिणामस्वरूप उनकी वाणी में अनेक भाषाओं और बोलियों का सुंदर सम्मिश्रण दिखाई देता है। अवधी, ब्रजभाषा, पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, उर्दू तथा फ़ारसी के शब्द सहज रूप से एक-दूसरे में समाहित होते गए।
भाषाई स्तर पर यह आदान-प्रदान भी सामासिक संस्कृति का उत्कृष्ट उदाहरण है। सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक समन्वय के साथ-साथ भाषाई समन्वय भी भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। भाषा तभी जीवंत बनती है जब वह विभिन्न स्रोतों से श्रेष्ठ तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता रखती है।
आज वैश्वीकरण के इस युग में भी भारत की सामासिक संस्कृति हमें सह-अस्तित्व, सहिष्णुता, समन्वय और परस्पर सम्मान का संदेश देती है। यह हमें सिखाती है कि विविधता विभाजन का कारण नहीं, बल्कि समृद्धि का आधार है। भारत ऐसा देश है जहाँ सामासिक संस्कृति को केवल देखा ही नहीं जाता, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुभव किया और प्रत्यक्ष जिया भी जाता है। यही कारण है कि यहाँ अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व तथा समस्त चराचर जगत के कल्याण की कामना की जाती है—
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
ये मंगलकामनाएँ भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिक दृष्टि का परिचय देती हैं। इनमें केवल अपने समाज या राष्ट्र के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता तथा समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना निहित है। यही भारतीय संस्कृति का वैश्विक स्वरूप है और विभिन्न संस्कृतियों का परस्पर समन्वय होकर एक व्यापक मानवीय संस्कृति का निर्माण करना ही "सामासिक संस्कृति" का सर्वोत्तम एवं प्रेरणादायक उदाहरण है।










