कांवड़ यात्रा एवं नशा निषेध : शिवभक्ति का वास्तविक स्वरूप
जुलाई के अंतिम सप्ताह में श्रावण माह के आगाज के साथ आरम्भ होने वाला विश्वविख्यात श्रावणी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, अपितु भारतीय आध्यात्मिक चेतना, तप, अनुशासन और आत्मशुद्धि का विराट उत्सव है। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु बिहार के अजगैबीनाथधाम में उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र जल भरकर लगभग 108 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा करते हुए झारखंड के बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर पहुँचते हैं और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक भगवान बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा केवल पैरों से तय की जाने वाली दूरी नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म को पवित्र बनाने की साधना है।अर्थात श्रद्धावान तथा इन्द्रियों को संयम में रखने वाला साधक ही वास्तविक ज्ञान और परम शांति प्राप्त करता है। वस्तुतः काँवड़ यात्रा का मूल संदेश भी यही है कि श्रद्धा तभी सार्थक है जब उसके साथ आत्मसंयम और सात्त्विक आचरण जुड़ा हो।
अर्थात बाहरी यात्रा तभी सफल है जब भीतर का मन निर्मल हो। यदि मन विकारों से भरा रहे तो तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
श्रावणी काँवड़ यात्रा का प्रत्येक नियम साधना का अंग है।
श्रावणी काँवड़ यात्रा का प्रत्येक नियम साधना का अंग है। काँवड़िया सात्त्विक भोजन करता है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है, भूमि पर शयन करता है, असत्य, क्रोध और हिंसा से दूर रहने का प्रयास करता है तथा निरंतर "बोल बम", "हर-हर महादेव" और "ॐ नमः शिवाय" का जप करते हुए आगे बढ़ता है। यह सम्पूर्ण यात्रा बाह्य से अधिक आंतरिक अनुशासन की यात्रा है।
अर्थात महेश्वर की आराधना का उद्देश्य केवल वरदान प्राप्त करना नहीं, बल्कि विवेक, ज्ञान और आत्मजागरण प्राप्त करना है।
शिव स्वयं योगेश्वर हैं, वैराग्य के प्रतीक हैं और इन्द्रिय-विजय के आदर्श हैं। ऐसे महादेव की यात्रा में यदि कोई व्यक्ति नशा, असंयम अथवा अनुशासनहीनता को स्थान देता है, तो वह शिवभक्ति के मूल भाव से दूर चला जाता है।
मानव का मन स्वभाव से चंचल है।
मानव का मन स्वभाव से चंचल है। इच्छाएँ, मोह, क्रोध और अहंकार उसे बार-बार विचलित करते हैं। इसलिए ऋषि-मुनियों ने मन को साधने को ही सबसे बड़ी साधना कहा है। आत्मा सदैव सत्य और धर्म की ओर प्रेरित करती है, किन्तु मन अनेक बार उसे भटका देता है। कांवड़ यात्रा इसी मन को अनुशासित करने, आत्मा की आवाज़ सुनने और अपने दोषों के लिए भगवान शिव के सम्मुख क्षमा याचना करने का अवसर है। जो भक्त विनम्र होकर बाबा बैद्यनाथ के चरणों में जल अर्पित करता है, वह वस्तुतः अपने अहंकार, विकार और दुर्बलताओं का भी समर्पण करता है।
श्रावणी यात्रा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परम्परा यह भी है कि गंगाजल भरने के पश्चात काँवड़ को भूमि पर नहीं रखा जाता।
श्रावणी यात्रा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परम्परा यह भी है कि गंगाजल भरने के पश्चात काँवड़ को भूमि पर नहीं रखा जाता। भक्त पूरे मार्ग में काँवड़ की पवित्रता बनाए रखते हैं, क्योंकि यह केवल जल का पात्र नहीं, बल्कि श्रद्धा और संकल्प का प्रतीक है। अनेक श्रद्धालु संपूर्ण यात्रा नंगे पाँव पूरी करते हैं, अनेक "डाक बम" के रूप में निरंतर दौड़ते हुए देवघर पहुँचते हैं, तो कुछ "खड़ा बम" व्रत का पालन करते हुए विशिष्ट तपस्या करते हैं। इन सभी परम्पराओं का मूल उद्देश्य शरीर को कष्ट देकर आत्मबल और संयम का विकास करना है, न कि भोग-विलास या उन्माद का प्रदर्शन।
दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में कुछ लोग इस पवित्र यात्रा के दौरान पान-मसाला, तंबाकू, सिगरेट, शराब, गांजा, भाँग तथा अन्य मादक पदार्थों का सेवन करते देखे जाते हैं।
दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में कुछ लोग इस पवित्र यात्रा के दौरान पान-मसाला, तंबाकू, सिगरेट, शराब, गांजा, भाँग तथा अन्य मादक पदार्थों का सेवन करते देखे जाते हैं। कुछ लोग इसे शिवभक्ति का अंग मानने की भूल भी करते हैं, जबकि इसका किसी भी शास्त्रीय परम्परा से कोई संबंध नहीं है। गेरुआ अथवा लाल वस्त्र धारण करना स्वयं में त्याग, संयम और सात्त्विकता का प्रतीक है। ऐसे में नशे का सेवन उस व्रत और संकल्प का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
अनेक लोग समुद्र-मंथन के प्रसंग का उल्लेख करते हुए यह तर्क देते हैं कि भगवान शिव ने विषपान किया था, इसलिए शिवभक्ति में मादक पदार्थों का सेवन अनुचित नहीं है।
अनेक लोग समुद्र-मंथन के प्रसंग का उल्लेख करते हुए यह तर्क देते हैं कि भगवान शिव ने विषपान किया था, इसलिए शिवभक्ति में मादक पदार्थों का सेवन अनुचित नहीं है। यह तर्क न केवल शास्त्रविरुद्ध है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी भ्रामक है। समुद्र-मंथन के समय जब हलाहल विष निकला तो सम्पूर्ण सृष्टि उसके प्रभाव से संकट में पड़ गई। समस्त देवताओं और प्राणियों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण किया। उन्होंने उसे न तो आनंद के लिए ग्रहण किया और न ही शरीर में उतारा, बल्कि लोककल्याण के लिए अपने कंठ में रोक लिया। इसी त्याग के कारण वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग त्याग, करुणा और लोकमंगल का प्रतीक है, न कि किसी प्रकार के नशे का समर्थन।
भगवान शिव का विषपान परहित और लोकरक्षा का सर्वोच्च उदाहरण है। इसे नशा या भोग से जोड़ना शिवतत्त्व का घोर अपमान है।
वास्तव में शिवभक्ति का सार है—सादगी, सेवा, संयम, करुणा और आत्मनियंत्रण।
वास्तव में शिवभक्ति का सार है—सादगी, सेवा, संयम, करुणा और आत्मनियंत्रण। भगवान शिव स्वयं भूतभावन हैं, आशुतोष हैं, परंतु वे योगियों के भी योगी हैं। उनकी आराधना बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि निर्मल अंतःकरण से स्वीकार होती है।
यह महामृत्युंजय मंत्र जीवन में आरोग्य, संयम, दीर्घायु और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करता है, न कि किसी प्रकार के व्यसन या उन्माद की।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि श्रावणी काँवड़ यात्रा को केवल एक धार्मिक उत्सव न मानकर आत्मशुद्धि और चरित्र-निर्माण का महापर्व समझा जाए।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि श्रावणी काँवड़ यात्रा को केवल एक धार्मिक उत्सव न मानकर आत्मशुद्धि और चरित्र-निर्माण का महापर्व समझा जाए। यदि प्रत्येक काँवड़िया यह संकल्प ले कि वह यात्रा के दौरान ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में भी नशामुक्त, संयमित और सात्त्विक जीवन जिएगा, तभी बाबा बैद्यनाथ की आराधना अपने वास्तविक अर्थों में सफल होगी।
आइए, इस श्रावणी मास में हम सब भगवान शिव के चरणों में यही प्रार्थना करें कि वे हमें सद्बुद्धि, संयम, सात्त्विकता और लोकमंगल की भावना प्रदान करें। "हर-हर महादेव" का उद्घोष तभी सार्थक होगा, जब हमारे जीवन में भी महादेव के त्याग, तप, करुणा और आत्मसंयम का प्रकाश दिखाई दे। यही काँवड़ यात्रा की आत्मा है और यही सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश।









